केदार के शहर बाँदा के बुद्धिजीवियों ,कला प्रेमियों तथा परिवर्तनकामी लोगो ने व्यापक वाम की अवधारणा के साथ 'शबरी ' नाम की संस्था का गठन 2007 में किया था। यह संस्था मूलतः सांस्कृतिक छेत्र में चल रहे आंदोलनों को मंच प्रदान करने के लिए गठित हुई है। इसी क्रम में यह संस्था प्रगतिशील आंदोलन के जनक मुंशी प्रेमचंद की स्मृति में कथा साहित्य में 21000 रुपए का पुरस्कार अपने गठन के समय से ही देती आ रही है।
अब तक यह पुरस्कार प्रभात रंजन,सुभाषकुश्वाहा ,दिनेश भट्ट,मोह आरिफ ,कैलाश वनवासी ,सत्यनारायण पटेल, संजीव बक्सी , नीलेश रघुवंशी व अल्पना मिश्र को दिया जा चुका है। इसके निर्णायक अमरकांत,शिवमूर्ति,ममता कालिया ,कामतानाथ ,ज्ञानरंजन ,अखिलेश ,संजीव ,प्रोफ राजेंद्र कुमार ,मैत्रेयी पुष्पा,रविभूषण ,विश्वनाथ त्रिपाठी तथा विष्णु खरे रह चुके है।
इस पुरस्कार में नामवर सिंह,मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह ,प्रणय कृष्ण ,प्रदीप सक्सेना ,ज्ञान रंजन ,मंगलेश डबराल,वीरेंद्र यादव जैसे हिंदी के शीर्ष हस्ताक्षर अपने वक्तव्य दे चुके है. यह पुरस्कार बाँदा शहर की जनता अपनी छोटी व अल्प बचत के सहयोग से करती है। इस पुरस्कार में किसी तरह का सरकारी व संस्थागत सहयोग नहीं लिया जाता है।
वर्ष 2015 के लिए यह पुरस्कार मदन मोहन के "उपन्यास जहाँ एक जंगल था " के लिए दिया जाता है है. यह उपन्यास पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई वाले हिस्से को अपनी कथा भूमि बनाता है जिसमे मध्यवर्गीय चरित्र के नैतिक ,सांस्कृतिक व राजनैतिकअंतर्द्वंद दर्ज किये गए है.राजनैतिक संगठन के आभाव में अपनी दिशा तलाश कर रहे आक्रोश का चित्रण इस उपन्यास को विशेष बनाता है.
वर्ष 2016 का सम्मान वरिष्ठ कथाकार संजीव के उपन्यास' फाँस ' के लिए दिया जाता है . फाँस के माध्यम से संजीव ने विदर्भ के किसानों की आत्महत्या से जुड़े बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के दुष्चक्र व पूंजीवादी सरकारों के मकड़जाल को भली भांति उजागर किया है.
मयंक खरे
सचिव -शबरी
A -56 इंदिरा नगर
बाँदा 210001
मोबाइल -9450169406
अब तक यह पुरस्कार प्रभात रंजन,सुभाषकुश्वाहा ,दिनेश भट्ट,मोह आरिफ ,कैलाश वनवासी ,सत्यनारायण पटेल, संजीव बक्सी , नीलेश रघुवंशी व अल्पना मिश्र को दिया जा चुका है। इसके निर्णायक अमरकांत,शिवमूर्ति,ममता कालिया ,कामतानाथ ,ज्ञानरंजन ,अखिलेश ,संजीव ,प्रोफ राजेंद्र कुमार ,मैत्रेयी पुष्पा,रविभूषण ,विश्वनाथ त्रिपाठी तथा विष्णु खरे रह चुके है।
इस पुरस्कार में नामवर सिंह,मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह ,प्रणय कृष्ण ,प्रदीप सक्सेना ,ज्ञान रंजन ,मंगलेश डबराल,वीरेंद्र यादव जैसे हिंदी के शीर्ष हस्ताक्षर अपने वक्तव्य दे चुके है. यह पुरस्कार बाँदा शहर की जनता अपनी छोटी व अल्प बचत के सहयोग से करती है। इस पुरस्कार में किसी तरह का सरकारी व संस्थागत सहयोग नहीं लिया जाता है।
वर्ष 2015 के लिए यह पुरस्कार मदन मोहन के "उपन्यास जहाँ एक जंगल था " के लिए दिया जाता है है. यह उपन्यास पूर्वी उत्तर प्रदेश के तराई वाले हिस्से को अपनी कथा भूमि बनाता है जिसमे मध्यवर्गीय चरित्र के नैतिक ,सांस्कृतिक व राजनैतिकअंतर्द्वंद दर्ज किये गए है.राजनैतिक संगठन के आभाव में अपनी दिशा तलाश कर रहे आक्रोश का चित्रण इस उपन्यास को विशेष बनाता है.
वर्ष 2016 का सम्मान वरिष्ठ कथाकार संजीव के उपन्यास' फाँस ' के लिए दिया जाता है . फाँस के माध्यम से संजीव ने विदर्भ के किसानों की आत्महत्या से जुड़े बहुराष्ट्रीय कम्पनियो के दुष्चक्र व पूंजीवादी सरकारों के मकड़जाल को भली भांति उजागर किया है.
मयंक खरे
सचिव -शबरी
A -56 इंदिरा नगर
बाँदा 210001
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