Thursday, November 18, 2010
Sunday, November 14, 2010
अशोक त्रिपाठी के नाम पत्र
आदरणीय अशोक जी,
हम केदार की छाया में पले- बढे बांदा वासी आपको तहे दिल से शुक्रिया अदा करते है की आपने केदार जन्मशती के आयोजन का बीड़ा उठाया है..यूं तो बाबूजी की जन्मशती इस शहर के स्थानीय नागरिको व बुद्धिजीविओ द्वारा मनाई जानी चाहिए तथा उसका सारा ब्यय भार भी हमें खुद ही वहन करना चाहिए चूँकि हम आपको बाबूजी द्वारा लगाया गया एक वृक्ष ही मानते है जिसके चलते आप के साथ हमें स्थानीयता का बोध भी रहता है.
आपने बाबूजी की जन्मशती के अवसर पर जो आयोजन समिति बनाई थी उसमे उस वक्त हमारे मन में कुछ सवाल थे चूँकि बाबूजी का मामला था इसलिए उस पर हमने कोई टीका-टिपण्णी नहीं की. हालाँकि आपके अलोकतांत्रिक काम-काज के तरीके से हमारी असहमति रही है फिरभी बाबूजी के नाम पर हम खामोश रहे.
अभी हाल ही में अध्यक्ष मंडल के एक सदस्य ने अपने साक्षात्कार में समस्त स्त्री लेखिकाओ पर जो टिप्पणी की है उससे हम सभी बहुत आहत हुए है. मैंने आपसे उस वक्त फ़ोन पर कहा था की इस प्रकार के व्यक्ति का बाबूजी की जन्मशती के अध्यक्ष मंडल में रहने से बाबूजी कि अवमानना ही होगी.तब आपने कहा था कि हम आगे कोई रास्ता निकाल लेंगे. उसके बाद आपने हमें अवगत कराया की आप अध्यक्ष मंडल की बैठक आहूत कर रहे है उसमे इस प्रकरण पर राय-मशविरा होगा. उसके कुछ समय पश्चात आपने फिर यह सूचित किया की यह करना आपके लिए संभव नहीं है. आपने कहा की यदि शबरी चाहे तो अपने स्तर पर यह आयोजन कर ले आप हमारी निजी तौर पर यथायोग्य मदद करेंगे.आपने यह भी कहा की आप साहित्य की राजनीति में नहीं पड़ना चाहते है. हमने फिरभी आपसे अनुरोध किया की आप इस आयोजन से अपने को मुक्त मत करिए क्योकि आपका बाबूजी के प्रति जो अनुराग है वह हमारे लिए गौरव व सम्मान की बात है और हमारा विरोध तो एक बयान को लेकर है. हम आपके बिना बांदा में किसी आयोजन की कल्पना भी नहीं करते है. लेकिन आपके रुख से ऐसा लगता है आपका उस स्त्री विरोधी बयान से कोई मतभेद नहीं है.आप द्वारा फिर यह सूचित किया जाता है की आप पूरी आयोजन समिति की बैठक बुलाकर उसमे इस प्रकरण पर चर्चा करेंगे.आपके इन वक्तव्यों से हम खुद भी यह नहीं समझ पाते है की पार्टनर आपकी पोलटिक्स क्या है.
इसी सन्दर्भ में हमने शबरी की आज एक बैठक बुलाई थी.जिसमे हम सभी का आमराए से यह मानना है की सवाल साहित्य की राजनीति का नहीं है,सवाल केदार की राजनीति का है. बाबूजी ने पूरे जीवन स्वकीया प्रेम की हिमायत की है.यह बाबूजी ही थे जिनकी कविताओ में लोहे की तरह मजबूत,आत्मसम्मान से भरी हुई स्त्री आती है.ऐसे महान कवि की जन्मशताब्दी के अवसर पर बनी आयोजन समिति के अध्यक्ष मंडल में ऐसे व्यक्ति के होने से मन उबकता है जो मूलतः स्त्री विरोधी है तथा अपने छुद्र वक्तव्यों से अपनी लेखकीय तथा संवैधानिक दोनों गरिमाओ को नस्ट कर रहा है.
अतः हमारा साफ़ मानना है की हम ऐसे किसी आयोजन में शामिल नहीं होंगे जिसके अध्यक्ष मंडल में इस तरह के लोग शामिल हो. हम समझते है की जो भी लोग केदार को बिना किसी लाभ-हानि के सच्चे दिल से चाहते होंगे वह अवश्य ही हमारे साथ आयेंगे और बाबूजी की जन्मशती को उनकी गरिमा व उनकी वैचारिकी के अनरूप मनाने में हमारी मदद करेंगे.
सादर
मयंक खरे
हम केदार की छाया में पले- बढे बांदा वासी आपको तहे दिल से शुक्रिया अदा करते है की आपने केदार जन्मशती के आयोजन का बीड़ा उठाया है..यूं तो बाबूजी की जन्मशती इस शहर के स्थानीय नागरिको व बुद्धिजीविओ द्वारा मनाई जानी चाहिए तथा उसका सारा ब्यय भार भी हमें खुद ही वहन करना चाहिए चूँकि हम आपको बाबूजी द्वारा लगाया गया एक वृक्ष ही मानते है जिसके चलते आप के साथ हमें स्थानीयता का बोध भी रहता है.
आपने बाबूजी की जन्मशती के अवसर पर जो आयोजन समिति बनाई थी उसमे उस वक्त हमारे मन में कुछ सवाल थे चूँकि बाबूजी का मामला था इसलिए उस पर हमने कोई टीका-टिपण्णी नहीं की. हालाँकि आपके अलोकतांत्रिक काम-काज के तरीके से हमारी असहमति रही है फिरभी बाबूजी के नाम पर हम खामोश रहे.
अभी हाल ही में अध्यक्ष मंडल के एक सदस्य ने अपने साक्षात्कार में समस्त स्त्री लेखिकाओ पर जो टिप्पणी की है उससे हम सभी बहुत आहत हुए है. मैंने आपसे उस वक्त फ़ोन पर कहा था की इस प्रकार के व्यक्ति का बाबूजी की जन्मशती के अध्यक्ष मंडल में रहने से बाबूजी कि अवमानना ही होगी.तब आपने कहा था कि हम आगे कोई रास्ता निकाल लेंगे. उसके बाद आपने हमें अवगत कराया की आप अध्यक्ष मंडल की बैठक आहूत कर रहे है उसमे इस प्रकरण पर राय-मशविरा होगा. उसके कुछ समय पश्चात आपने फिर यह सूचित किया की यह करना आपके लिए संभव नहीं है. आपने कहा की यदि शबरी चाहे तो अपने स्तर पर यह आयोजन कर ले आप हमारी निजी तौर पर यथायोग्य मदद करेंगे.आपने यह भी कहा की आप साहित्य की राजनीति में नहीं पड़ना चाहते है. हमने फिरभी आपसे अनुरोध किया की आप इस आयोजन से अपने को मुक्त मत करिए क्योकि आपका बाबूजी के प्रति जो अनुराग है वह हमारे लिए गौरव व सम्मान की बात है और हमारा विरोध तो एक बयान को लेकर है. हम आपके बिना बांदा में किसी आयोजन की कल्पना भी नहीं करते है. लेकिन आपके रुख से ऐसा लगता है आपका उस स्त्री विरोधी बयान से कोई मतभेद नहीं है.आप द्वारा फिर यह सूचित किया जाता है की आप पूरी आयोजन समिति की बैठक बुलाकर उसमे इस प्रकरण पर चर्चा करेंगे.आपके इन वक्तव्यों से हम खुद भी यह नहीं समझ पाते है की पार्टनर आपकी पोलटिक्स क्या है.
इसी सन्दर्भ में हमने शबरी की आज एक बैठक बुलाई थी.जिसमे हम सभी का आमराए से यह मानना है की सवाल साहित्य की राजनीति का नहीं है,सवाल केदार की राजनीति का है. बाबूजी ने पूरे जीवन स्वकीया प्रेम की हिमायत की है.यह बाबूजी ही थे जिनकी कविताओ में लोहे की तरह मजबूत,आत्मसम्मान से भरी हुई स्त्री आती है.ऐसे महान कवि की जन्मशताब्दी के अवसर पर बनी आयोजन समिति के अध्यक्ष मंडल में ऐसे व्यक्ति के होने से मन उबकता है जो मूलतः स्त्री विरोधी है तथा अपने छुद्र वक्तव्यों से अपनी लेखकीय तथा संवैधानिक दोनों गरिमाओ को नस्ट कर रहा है.
अतः हमारा साफ़ मानना है की हम ऐसे किसी आयोजन में शामिल नहीं होंगे जिसके अध्यक्ष मंडल में इस तरह के लोग शामिल हो. हम समझते है की जो भी लोग केदार को बिना किसी लाभ-हानि के सच्चे दिल से चाहते होंगे वह अवश्य ही हमारे साथ आयेंगे और बाबूजी की जन्मशती को उनकी गरिमा व उनकी वैचारिकी के अनरूप मनाने में हमारी मदद करेंगे.
सादर
मयंक खरे
Sunday, November 7, 2010
प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान 2010
एक लम्बे अरसे से साहित्य पटल पर उत्तर प्रदेश का बांदा जिला किसी दिल्ली,किसी भोपाल,किसी पटना या किसी लखनऊ से कम चर्चा में नहीं रहा है | इसका कारण है इस स्थान का कवि केदार कि जन्मभूमि व कर्मभूमि का होना.पिछले डेढ़ दशक से इस जिले के साहित्य प्रेमी केदार के नाम से जोड़कर पुरस्कार व गोष्टी करते रहे है | इस साहित्यिक परंपरा के और पीछे जाने पर पदमाकर,तुलसीदास, महाकवि वाल्मीकि भी इसी धरती कि उपज है |
इसी परंपरा में एक नवीन कड़ी जोड़ते हुए वर्ष २००६ में कथा विधा को केंद्र में रखकर युवा कथाकारों के लिए प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान का आयोजन प्रारंभ किया गया.जिसका आयोजन इस शहर कि शबरी संस्था द्वारा किया जाता है.आयोजको से बात करने पर पता चला कि यह संस्था साहित्य में प्रेमचंद व केदार कि छीजती परंपरा को आगे बढ़ाने व व्यापक जनवादी आन्दोलन हेतु प्रयासरत व्यक्तियों व समूहों को मंच प्रदान करती है |
अब तक इस आयोजन में मुख्य रूप से नामवर सिंह,राजेंद्र कुमार,ममता कालिया, अजेय कुमार,प्रदीप सक्सेना, प्रणय कृष्ण, मुरली बाबू, मैत्रेयी पुष्पा, शिवमूर्ति, अखिलेश, वीरेन्द्र यादव, महेश कटारे, रेखा अवस्थी, गोविन्द मिश्रा, हरिनारायण, संजीव, ज्ञानरंजन शामिल हुए | इसके निर्णायक मंडल में श्री अमरकांत, नमिता सिंह, शिवमूर्ति, राजेंद्र कुमार, ममता कालिया, कामतानाथ, अखिलेश, संजीव, मैत्रेयी पुष्पा शामिल थी| इसका पहला पुरस्कार २००६ में प्रभातरंजन व सुभाष कुशवाहा को संयुक्त रूप से दिया गया | दूसरा पुरस्कार दिनेश भट्ट को दिया गया.तीसरा पुरस्कार मोहम्मद आरिफ को दिया गया |
प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान का चौथा आयोजन ३०/१०/२०१० को बांदा में होटल सारंग के सभागार में युवा कहानीकार कैलाश वनवासी को उनके कहानी संग्रह पीले कागज कि उजली इबारत के लिए वरिष्ट कथाकार व पहल के संपादक श्री ज्ञानरंजन द्वारा दिया गया | मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए ज्ञानजी ने कहा कि शबरी द्वारा आयोजित यह सम्मान अँधेरे में रोशन एक छोटी किन्तु उत्साहित करने वाली लौ बताया | उन्होंने कहा कि हिंदी के घटते सम्मान व पुरस्कारों कि घटती विश्वसनीयता के बीच यह एक अच्छी पहल है | उन्होंने हिंदी समाज में लेखको कि असम्मानजनक स्थिति, बाज़ार के बढ़ते दवाब और काली पूँजी के प्रवाह और इन सबका सांस्कृतिक आंदोलनों पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि छोटे छोटे गाँव-कस्बो में दिए जाने वाले पुरस्कार इस अँधेरे में लड़ेंगे जिससे कोहरा छटेगा | आयोजन समिति कि तरफ से शबरी के सचिव मयंक खरे ने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि यह केदार के बांदा का साहित्य के प्रति विशेष अनुराग है जिसके कारण वह स्थानीय जनता कि मदद से इतना बड़ा आयोजन कर पाते है | उन्होंने जोर देकर कहा कि यह संस्था किसी भी सरकारी व संस्थागत मदद को स्वीकार नहीं करती है | सम्मान के निर्णायक के रूप में बोलते हुए शिवमूर्ति ने कहा कि कैलाश प्रेमचंद कि परंपरा के सच्चे उत्तराधिकारी है | उनके कथा साहित्य में आम जन जिस सहजता से आता है वह सामान्य तौर पे कथा साहित्य में विलुप्त होता जा रहा है. महेश कटारे ने कैलाश कि कहानियो कि चर्चा करते हुए कहा कि वह यथार्थ का सही चित्रण करने वाले कथाकार है | समारोह कि अध्यक्षता करते हुए मुरली बाबू ने कहा कि वह जब १८ वर्ष के थे तब वह केदारजी से मिलने बांदा आये थे | बांदा कि धरती से उनका एक रागातात्मक सबंध रहा है आज इस शहर से प्रेमचंद के नाम से सम्मान दिया जा रहा है यह उनके लिए संतोष कि बात है | उन्होंने वैश्विक पूँजी के दुस्प्रभावो कि चर्चा करते हुए कहा कि आज आम जन जिन परेसानियो से गुजर रहा है उसके केंद्र में यह नई आर्थिक व्यस्था ही है |
शाम को एक गोष्टी भी हुई जिसका विषय था समकालीन महिला लेखन नई शताब्दी नई चुनौती इसका आधार वक्तव्य श्री वीरेन्द्र यादव ने दिया. वक्ता के तौर पे अल्पना मिश्रा, रेखा अवस्थी, अजेय कुमार तथा मुख्य वक्ता मैत्रेयी पुष्पा थी.अध्यक्षता हंस के कार्यकारी संपादक संजीव ने कि. इस आयोजन में श्री विवेक निराला, सूर्यनारायण, नीरज खरे, दिनेश भट्ट. सभा का संचालन डॉ रंजना सैरहा ने किया |
बांदा जैसे स्थान में अतिथियो के ठहरने कि व्यस्था, भोजन, सभास्थल बड़े बड़े-बड़े सरकारी व संस्थागत आयोजनों में होने वाली व्यस्था को आइना दिखाती है.आयोजको से बात करने पर यह पता चला कि यह सब बांदा कि साहित्य प्रेमी जनता के छोटे-छोटे सहयोग से किया जाता है | इससे यह स्पस्ट हो जाता है कि केदार के बांदा में साहित्य के प्रति जो अनुराग बचा हुआ है.वह अब हिंदी जगत में दुर्लभ होता जा रहा है | मेरा इस शानदार आयोजन के लिए बांदा कि जनता को सलाम |
प्रस्तुति-वर्तिका शिवहरे
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