एक लम्बे अरसे से साहित्य पटल पर उत्तर प्रदेश का बांदा जिला किसी दिल्ली,किसी भोपाल,किसी पटना या किसी लखनऊ से कम चर्चा में नहीं रहा है | इसका कारण है इस स्थान का कवि केदार कि जन्मभूमि व कर्मभूमि का होना.पिछले डेढ़ दशक से इस जिले के साहित्य प्रेमी केदार के नाम से जोड़कर पुरस्कार व गोष्टी करते रहे है | इस साहित्यिक परंपरा के और पीछे जाने पर पदमाकर,तुलसीदास, महाकवि वाल्मीकि भी इसी धरती कि उपज है |
इसी परंपरा में एक नवीन कड़ी जोड़ते हुए वर्ष २००६ में कथा विधा को केंद्र में रखकर युवा कथाकारों के लिए प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान का आयोजन प्रारंभ किया गया.जिसका आयोजन इस शहर कि शबरी संस्था द्वारा किया जाता है.आयोजको से बात करने पर पता चला कि यह संस्था साहित्य में प्रेमचंद व केदार कि छीजती परंपरा को आगे बढ़ाने व व्यापक जनवादी आन्दोलन हेतु प्रयासरत व्यक्तियों व समूहों को मंच प्रदान करती है |
अब तक इस आयोजन में मुख्य रूप से नामवर सिंह,राजेंद्र कुमार,ममता कालिया, अजेय कुमार,प्रदीप सक्सेना, प्रणय कृष्ण, मुरली बाबू, मैत्रेयी पुष्पा, शिवमूर्ति, अखिलेश, वीरेन्द्र यादव, महेश कटारे, रेखा अवस्थी, गोविन्द मिश्रा, हरिनारायण, संजीव, ज्ञानरंजन शामिल हुए | इसके निर्णायक मंडल में श्री अमरकांत, नमिता सिंह, शिवमूर्ति, राजेंद्र कुमार, ममता कालिया, कामतानाथ, अखिलेश, संजीव, मैत्रेयी पुष्पा शामिल थी| इसका पहला पुरस्कार २००६ में प्रभातरंजन व सुभाष कुशवाहा को संयुक्त रूप से दिया गया | दूसरा पुरस्कार दिनेश भट्ट को दिया गया.तीसरा पुरस्कार मोहम्मद आरिफ को दिया गया |
प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान का चौथा आयोजन ३०/१०/२०१० को बांदा में होटल सारंग के सभागार में युवा कहानीकार कैलाश वनवासी को उनके कहानी संग्रह पीले कागज कि उजली इबारत के लिए वरिष्ट कथाकार व पहल के संपादक श्री ज्ञानरंजन द्वारा दिया गया | मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए ज्ञानजी ने कहा कि शबरी द्वारा आयोजित यह सम्मान अँधेरे में रोशन एक छोटी किन्तु उत्साहित करने वाली लौ बताया | उन्होंने कहा कि हिंदी के घटते सम्मान व पुरस्कारों कि घटती विश्वसनीयता के बीच यह एक अच्छी पहल है | उन्होंने हिंदी समाज में लेखको कि असम्मानजनक स्थिति, बाज़ार के बढ़ते दवाब और काली पूँजी के प्रवाह और इन सबका सांस्कृतिक आंदोलनों पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख करते हुए रेखांकित किया कि छोटे छोटे गाँव-कस्बो में दिए जाने वाले पुरस्कार इस अँधेरे में लड़ेंगे जिससे कोहरा छटेगा | आयोजन समिति कि तरफ से शबरी के सचिव मयंक खरे ने अपना वक्तव्य रखते हुए कहा कि यह केदार के बांदा का साहित्य के प्रति विशेष अनुराग है जिसके कारण वह स्थानीय जनता कि मदद से इतना बड़ा आयोजन कर पाते है | उन्होंने जोर देकर कहा कि यह संस्था किसी भी सरकारी व संस्थागत मदद को स्वीकार नहीं करती है | सम्मान के निर्णायक के रूप में बोलते हुए शिवमूर्ति ने कहा कि कैलाश प्रेमचंद कि परंपरा के सच्चे उत्तराधिकारी है | उनके कथा साहित्य में आम जन जिस सहजता से आता है वह सामान्य तौर पे कथा साहित्य में विलुप्त होता जा रहा है. महेश कटारे ने कैलाश कि कहानियो कि चर्चा करते हुए कहा कि वह यथार्थ का सही चित्रण करने वाले कथाकार है | समारोह कि अध्यक्षता करते हुए मुरली बाबू ने कहा कि वह जब १८ वर्ष के थे तब वह केदारजी से मिलने बांदा आये थे | बांदा कि धरती से उनका एक रागातात्मक सबंध रहा है आज इस शहर से प्रेमचंद के नाम से सम्मान दिया जा रहा है यह उनके लिए संतोष कि बात है | उन्होंने वैश्विक पूँजी के दुस्प्रभावो कि चर्चा करते हुए कहा कि आज आम जन जिन परेसानियो से गुजर रहा है उसके केंद्र में यह नई आर्थिक व्यस्था ही है |
शाम को एक गोष्टी भी हुई जिसका विषय था समकालीन महिला लेखन नई शताब्दी नई चुनौती इसका आधार वक्तव्य श्री वीरेन्द्र यादव ने दिया. वक्ता के तौर पे अल्पना मिश्रा, रेखा अवस्थी, अजेय कुमार तथा मुख्य वक्ता मैत्रेयी पुष्पा थी.अध्यक्षता हंस के कार्यकारी संपादक संजीव ने कि. इस आयोजन में श्री विवेक निराला, सूर्यनारायण, नीरज खरे, दिनेश भट्ट. सभा का संचालन डॉ रंजना सैरहा ने किया |
बांदा जैसे स्थान में अतिथियो के ठहरने कि व्यस्था, भोजन, सभास्थल बड़े बड़े-बड़े सरकारी व संस्थागत आयोजनों में होने वाली व्यस्था को आइना दिखाती है.आयोजको से बात करने पर यह पता चला कि यह सब बांदा कि साहित्य प्रेमी जनता के छोटे-छोटे सहयोग से किया जाता है | इससे यह स्पस्ट हो जाता है कि केदार के बांदा में साहित्य के प्रति जो अनुराग बचा हुआ है.वह अब हिंदी जगत में दुर्लभ होता जा रहा है | मेरा इस शानदार आयोजन के लिए बांदा कि जनता को सलाम |
प्रस्तुति-वर्तिका शिवहरे
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