Tuesday, October 26, 2010
प्रगतिशील आन्दोलन
अभी हाल ही में विभूति प्रकरण की काफी चर्चा हुई होना भी थी आखिर विभूति ने बात ही कुछ ऐसी कर दी थी. सवाल यह नहीं है की एक लेखक द्वारा इस तरह की टिपण्णी की गई. सवाल यह है कि यह साक्षात्कार कुछ सवाल भी खड़े करता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिस व्यक्ति को हम प्रगतिशील और जाने क्या क्या उपमाये देने से नहीं थकते थे.वह व्यक्ति अचानक इतना अराजक हो गया कि सारा प्रगतिशील आन्दोलन शर्मशार हो गया. दरअसल आज का मार्क्सवाद इसी मतिभ्रम का शिकार हो गया है.हमारे बीच में आज भी बहुत से ऐसे साथी है जो वामपंथ को अपने हित साधने का हथियार बनाये बैठे है.कोई प्रगतिशील खेमे में सिर्फ इस लिए सामिल है कि वह आज भी जानता है कि आगे नौकरी,छपास,पुरस्कार,यह सभी इन्ही मार्क्सवादी बुध्जिवियो कि मदद से होना है.यहाँ तक कि कमुनिस्ट पार्टियों के पूर्ण कालिक सदस्य भी अपनी पार्टियों से वेज भी लेते है और ट्रक बस भी चलवाते है. और हम आँख मूँद कर कभी साम्प्रदायिकता के नाम पर कभी किसी कारन से ऐसी लोगो को महान क्रांतिकारी होने का प्रमाण पत्र देते रहे. दरअसल आज जो लोग वाम आन्दोलन के मुखिया है उन्हें न तो जनता के बीच काम करने का कभी अनुभव रहा है और न ही वह जनता के सरोकारों को कभी महसूस किया है. इसी कारन पूरे प्रगतिशील आन्दोलन में अवसरवादी घुस आये है कि उनकी करतूतों से पूरा वाम जगत शर्मसार हो जाता है. और ऐसे ही मौके पर वो सारे लोग हमलावर हो जाते है. चाहे वह मृणाल हो या अशोक बाजपेई, और तो और वो छुटभैये भी जो कभी अपनी जरूरतों के लिए वाम दरवाजो पर अपना सर झुकाते थे वह भी हमलावर हो जाते है.
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