Sunday, November 14, 2010

अशोक त्रिपाठी के नाम पत्र

आदरणीय अशोक जी,
हम केदार की छाया में पले- बढे बांदा वासी आपको तहे दिल से शुक्रिया अदा करते है की आपने केदार जन्मशती के आयोजन का बीड़ा उठाया है..यूं तो बाबूजी की जन्मशती इस शहर के स्थानीय नागरिको व बुद्धिजीविओ द्वारा मनाई जानी चाहिए तथा उसका सारा ब्यय भार भी हमें खुद ही वहन करना चाहिए चूँकि हम आपको बाबूजी द्वारा लगाया गया एक वृक्ष ही मानते है जिसके चलते आप के साथ हमें स्थानीयता का बोध भी रहता है.
            
     आपने बाबूजी की जन्मशती के अवसर पर जो आयोजन समिति बनाई थी उसमे उस वक्त हमारे मन में कुछ सवाल थे चूँकि बाबूजी का मामला था इसलिए उस पर हमने कोई टीका-टिपण्णी नहीं की. हालाँकि आपके अलोकतांत्रिक काम-काज के तरीके से हमारी असहमति रही है फिरभी बाबूजी के नाम पर हम खामोश रहे.
      अभी हाल ही में अध्यक्ष मंडल के एक सदस्य ने अपने साक्षात्कार में समस्त स्त्री लेखिकाओ पर जो टिप्पणी की है उससे हम सभी बहुत आहत हुए है. मैंने आपसे उस वक्त फ़ोन पर कहा था की इस प्रकार के व्यक्ति का बाबूजी की जन्मशती के अध्यक्ष मंडल में रहने से बाबूजी कि अवमानना ही होगी.तब आपने कहा था कि हम आगे कोई रास्ता निकाल लेंगे. उसके बाद आपने हमें अवगत कराया की आप अध्यक्ष मंडल की बैठक आहूत कर रहे है उसमे  इस प्रकरण पर राय-मशविरा होगा. उसके कुछ समय पश्चात आपने फिर यह सूचित किया की यह करना आपके लिए संभव नहीं है. आपने कहा की यदि शबरी चाहे तो अपने स्तर पर यह आयोजन कर ले आप हमारी निजी तौर पर यथायोग्य मदद करेंगे.आपने यह भी कहा की आप साहित्य की राजनीति में नहीं पड़ना चाहते है. हमने फिरभी आपसे अनुरोध किया की आप इस आयोजन से अपने को मुक्त मत करिए क्योकि आपका बाबूजी के प्रति जो अनुराग है वह हमारे लिए गौरव व सम्मान की बात है और हमारा विरोध तो एक बयान को लेकर है. हम आपके बिना बांदा में किसी आयोजन की कल्पना भी नहीं करते है. लेकिन आपके रुख से ऐसा लगता है आपका उस स्त्री विरोधी बयान से कोई मतभेद नहीं है.आप द्वारा फिर यह सूचित किया जाता है की आप पूरी आयोजन समिति की बैठक बुलाकर उसमे इस प्रकरण पर चर्चा करेंगे.आपके इन वक्तव्यों से हम खुद भी यह नहीं समझ पाते है की पार्टनर आपकी पोलटिक्स क्या है.
        इसी सन्दर्भ में हमने शबरी की आज एक बैठक बुलाई थी.जिसमे हम सभी का आमराए से यह मानना है की सवाल साहित्य की राजनीति का नहीं है,सवाल केदार की राजनीति का है. बाबूजी ने पूरे जीवन स्वकीया प्रेम की हिमायत की है.यह बाबूजी ही थे जिनकी कविताओ में लोहे की तरह मजबूत,आत्मसम्मान से भरी हुई स्त्री आती है.ऐसे महान कवि की जन्मशताब्दी के अवसर पर बनी आयोजन समिति के अध्यक्ष मंडल में ऐसे व्यक्ति के होने से मन उबकता है जो मूलतः स्त्री विरोधी है तथा अपने छुद्र वक्तव्यों से अपनी लेखकीय तथा संवैधानिक दोनों गरिमाओ को नस्ट कर रहा है.
         अतः हमारा साफ़ मानना है की हम ऐसे किसी आयोजन में शामिल नहीं होंगे जिसके अध्यक्ष मंडल में इस तरह के लोग शामिल हो. हम समझते है की जो भी लोग केदार को बिना किसी लाभ-हानि के सच्चे दिल से चाहते होंगे वह अवश्य ही हमारे साथ आयेंगे और बाबूजी की जन्मशती को उनकी गरिमा व उनकी वैचारिकी के अनरूप मनाने में हमारी मदद करेंगे. 
                                                                
                                                                       सादर
                                                                                                          मयंक खरे

2 comments:

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    आप भी सादर आमंत्रित हैं,

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