Sunday, October 17, 2010

यह कैसी धर्म संस्कृति है

यह कैसी धर्म संस्कृति है1अभी नवरात्री पर मै बाज़ार से गुजर रहा था.1 रास्ते में मैंने देखा हजारो की तादाद में लोगो का जलूस मूर्तियों के विसर्जन हेतु अबीर गुलाल लगाये हुए नाच गा रहे है काफी लोग उसमे शराब भी पिए हुए है ऐसा लग ही नहीं रहा था की यह किसी धार्मिक उत्सव का हिस्सा है .विशुद्ध रूप किसी अराज़क होते समाज की एक नई तस्वीर दिख रही थी .कोई कट्टा लिए था तो कोई तलवार लिए हुए था मानो हिन्दू धर्म संस्कृति को बचाने अब यही रास्ता बचा हो देवी भी अपने भक्तो के इस रूप को देखकर स्तब्ध होगी. नाच गाने के इस शोर में हमारी बहनों बेटियों पर क्या गुजर रही होगी जब उनके सामने से शोभा यात्रा गुजरती थी तो नाचने गाने की रफ़्तार ही दूसरी  होती थी कुछ मनचले फिकरे भी कस देते थे. आखिर यह कैसा समाज हम धर्म की आड़ में रच रहे है. क्या यही हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना का समाज है. क्या इसी से हम अपने गौरवशाली अतीत को याद करेगे. आखिर कब तक समाज को इन हिन्दू तालिबानों के इन अतिवादी और बेहद गैर जिम्मेदार तौर तरीको को बर्दास्त करता रहना पड़ेगा.
आज सबसे बड़ा सवाल यही है की हमारी गंगा-जमुना संस्कृति पर यह जो हमले हो रहे है ,उसमे एक बड़ा तबका जो आज भी यह मानता है की हमारी अपनी एक सांझी परंपरा है  उसकी हिंसक चुप्पी कुछ बेचैन करती है और सवाल भी उठाती है की यह आयोजन किसकी  सह पर हो रहे है कौन इसका आर्थिक संयोजन कर रहे है.राजनीतिक पार्टियों की भूमिका तो और भी संदिग्ध दिखती है चाहे वह कांग्रेस हो या सपा सब इसी भीड़ में अपना वोट तलाश रहे है.भाजपा की स्थिति से मेरे मन में कोई तकलीफ और संसय का भाव नहीं है उनकी राजनीति तो साफ है जनता ने उनको सही जगह में पंहुचा दिया है लेकिन वो लोग जो सेकुलरिस्म की आड़ में अपना चेहरा चमकाए घुमते है उनके तौर तरीको से काफी निरासा हुई है.आज यह समय की जरूरत है की ऐसे लोगो को आगे आना पड़ेगा जो अपने घरो में बैठकर पूरी व्यस्था को लानत मलानत कर अपने समाज चिन्तक होने का धर्म पूरा कर लेते है और फिर उसी व्यस्था में उन्ही लोगो से अपने हित साधने की जुगत में लग जाते है.
                                                                                                                   मयंक खरे

1 comment:

  1. blog shuru karne par meri badhai. behad achcha madhyam hai kyonki isne lekhak ko sabse zyada azadee dee hai. beech mein koi sampadak nahi, chchapane kee chinta se mukt aap kuch bhee likh sakte hain, lekin is vidhaa kaa bhayanak istemaal bhee hua hai, behad arajak bhee hindi mein. so bachaiyega bhee khud ko . shubkamnaen. pranay

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